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আনমনা কিশোর | The Absentminded Boy | अनमना किशोर | الفتى الشارد الذهن


শুয়ে ছিলাম বিছানায়, মাথা বালিশের কোণে

পড়ছিলাম কোনও বই, হয়তো আনমনে!

হঠাৎ শো-শো! ঝম-ঝম! কিসের শব্দ হয়?

হয়তো ফ্যান; নাকি ফ্রিজ, নাকি নিছক ভয়!

ক্ষণিকেই এক ফোঁটা, দু’ফোঁটা, হাজার ফোঁটা ...

বৃষ্টি!! ভেবে অবাক! দিলাম নিজেকেই খোঁটা-

 

“একসময় তুই বৃষ্টি দেখে হতিস ভাবনা-বিভোর,

এখন বৃষ্টির শব্দ চিনিস্ না? হায়রে বোকা কিশোর!

বৃষ্টি নিয়ে, বৃষ্টি মাঝে করেছিস কতো খেলা;

বৃষ্টির ছন্দে ভাসিয়েছিস কতো স্বপ্নানন্দ ভেলা-

এতটুকু স্মৃতিই মনে নেই তোর, হলি কি আত্মভোলা?

জীবনের খেলা সাঙ্গ হতে বাকি আছে তোর ঢের।

এখনই তবে ম্রিয়মাণ কেনো (তুই) কিশোর নামের হের্!

কিশোরই যদি, ভিড়িস্ না সে দলে, যে দল অধমদের।”

 

[16 August 2010, 03:00 PM] "The Absentminded Boy"

I was lying on my bed, head on the pillow’s edge,

Reading some book—perhaps, without a pledge.

Suddenly—whoosh! splash!—what sound was that?

The fan, perhaps? Or fridge? Or just a fear that sat

Then drop by drop, in thousands it fell...

Rain!! I was stunned—at myself I began to yell—


"Once, you’d lose yourself in rain’s tender roar,

Now you can’t even tell it apart? Oh, clueless boy of yore!

You played in the rain, you danced in its tune,

You floated dreams on monsoon afternoons—

And now, not a single memory remains in your core?

Your game of life isn’t near its end—there’s so much more.

Then why this fading light, why this silence in your shore?

If you’re truly still a boy—Don’t stand among the fallen, don’t forget your lore.”


📅 [Written on: 16 August 2010, 03:00 PM]



अनमना किशोर

मैं लेटा था बिस्तर पर, तकिए के कोने में सिर,

शायद कोई किताब पढ़ रहा था, बिना कोई ज़िक्र।

अचानक—शूं-शूं! झम-झम! कैसी ये आवाज़ आई?

पंखा होगा? या फ्रिज? या फिर कोई डर समाई?

क्षणभर में एक बूँद, दो बूँद, हज़ारों बूँदें बरसीं...

बारिश!! सोचकर चौंका—खुद पर ही हँसी आई, हँसी हँसी में डांट भी खाई—


"कभी बारिश में खो जाता था तू सोचों में,

अब आवाज़ भी न पहचाने? ओ भोले किशोर, तू कहाँ खो गया है इनमें?

तूने बारिश में खेले हैं कितने खेल,

तूने बहाए थे सपनों के कितने नर्म मेल—

क्या अब तुझमें याद की एक भी किरण नहीं बची?

अभी तो जीवन की चाल बाकी है, बहुत कुछ है सजी।

फिर भी तू इतना शांत, इतना थका-सा क्यों है?

अगर तू अब भी ‘किशोर’ है,

तो उन गिरे हुओं की कतार में क्यों खड़ा है?"


📅 [लिखा गया: १६ अगस्त २०१०, दोपहर ३:०० बजे]



الفتى الشارد الذهن


كنتُ مستلقيًا على السرير، رأسي عند طرف الوسادة

،أقرأ كتابًا ما، ربما بلا انتباه ولا إرادة

.فجأةً — ششش! طق طق! أيُّ صوتٍ هذا إذًا؟مروحة؟ أم ثلاجة؟

أم مجرد خوفٍ سكن البدن؟

ثم قطرة... قطرتان... آلاف القطرات تنهمر بلا وداع

،مطر! اندهشتُ — ولامتني نفسي في انطباع:


"ألم تكن أنت من كان يغرق في فكرٍ عند نزول المطر؟

والآن لا تميّز صوته؟ يا أيها الفتى الساذج، أين ذهب منك الأثر؟

كم لعبتَ تحت المطر، وركضت في رذاذه فرِحًا

،وكم أطلقتَ سفنَ الأحلام، في إيقاعِه طَرِبًا

،هل نَسِيتَ كلَّ هذا؟ أين ذهبتَ يا من كنتَ طفلاً شغوفًا؟

ما زالَت حياةُ اللعب بعيدة عن النهاية

،فلماذا إذًا هذا الانطفاء فيكَ الآن يا فتى الهداية؟

إن كنتَ فتىً بحق

،فلا تقف في صفِّ المنهزمين، ولا تترك بصمتكَ للحكاية."


📅 [كُتبت في: ١٦ أغسطس ٢٠١٠، الساعة ٣:٠٠ مساءً]

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